हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (र.अ.) की ज़िंदगी: अल्लाह की तलवार की पूरी कहानी

Hazrat Khalid Bin Waleed (R.A.) Ki Zindagi: Allah Ki Talwar Ki Full Story in Hindi.

हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (र.अ.) इस्लामी तारीख़ के सबसे बड़े सिपहसालारों में से एक हैं। उन्हें "सैफुल्लाह" यानी "अल्लाह की तलवार" के नाम से जाना जाता है। उनकी ज़िंदगी न सिर्फ़ बहादुरी और जंगी हिकमतों की मिसाल है, बल्कि ये भी सिखाती है कि इंसान अपनी ग़लतियों से सबक़ लेकर हक़ की राह पर चल सकता है। इस मज़मून में हम हज़रत ख़ालिद बिन वलीद की ज़िंदगी को तफ़्सील से देखेंगे, उनके शुरूआती दिनों से लेकर आख़िरी वक़्त तक। ये मज़मून ख़ास तौर पर उन लोगों के लिए है जो इस्लामी तारीख़ में दिलचस्पी रखते हैं और ख़ालिद बिन वलीद की जंगों और उनकी ज़िंदगी के बारे में जानना चाहते हैं। हम आसान और आम मुसलमानों की ज़बान में लिखेंगे ताकि पढ़ने में मज़ा आए। Read Also : हज़रत बिलाल (र.अ.) की जीवनी: इस्लाम के पहले मुअज्जिन की प्रेरणादायक कहानी हिंदी में।


Hazrat Khalid Bin Waleed (R.A.) Ki Zindagi: Allah Ki Talwar Ki Full Story in Hindi.
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ख़ालिद बिन वलीद की कहानी मक्का से शुरू होती है, जहां वो एक बड़े ख़ानदान में पैदा हुए। पहले वो इस्लाम के ख़िलाफ़ लड़े, मगर बाद में इस्लाम क़बूल करके मुसलमानों की फ़ौज के सबसे बड़े कमांडर बने। उन्होंने सौ से ज़्यादा जंगें लड़ीं और कभी हारे नहीं। उनकी जंगी हिकमतें आज भी फ़ौजी माहिरीन पढ़ते हैं। आइए, उनकी ज़िंदगी की इस सैर को शुरू करते हैं।

शुरूआती ज़िंदगी और ख़ानदान

हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (र.अ.) की पैदाइश तक़रीबन 592 ईसवी में मक्का में हुई। वो क़ुरैश क़बीले की बनू मख़ज़ूम शाख़ा से थे, जो मक्का के सबसे ज़बरदस्त और दौलतमंद क़बीलों में से एक था। उनके वालिद का नाम वलीद बिन मुग़ीरा था, जो मक्का में झगड़ों का फ़ैसला करने वाले माने-जाने शख़्स थे। क़ुरआन में उनके वालिद को नबी मुहम्मद (स.अ.व.) का मज़ाक़ उड़ाने वाले के तौर पर ज़िक्र किया गया है। उनकी वालिदा का नाम अस्मा बिन्त अल-हारिस था, जो बनू हिलाल क़बीले से थीं और बाद में इस्लाम क़बूल कर लिया।

ख़ालिद को बचपन से ही घुड़सवारी, तीरंदाज़ी और जंगी फ़न की तालीम मिली। वो मक्का के अमीर ख़ानदान से थे, लिहाज़ा उनकी तालीम और ज़िंदगी का ढंग ऊंचा था। बनू मख़ज़ूम क़बीला तिजारत, अक़्लमंदी और बहादुरी के लिए मशहूर था। ख़ालिद की शक्ल और आवाज़ हज़रत उमर (र.अ.) से मिलती-जुलती थी। उनके ख़ानदान की वजह से वो बेदुइन ज़िंदगी से भी वाक़िफ़ थे, जो बाद में उनकी जंगी हिकमतों में काम आया। इस दौर में मक्का में शिर्क (बहुदेववाद) आम था, और ख़ालिद भी शुरू में उसी पर यक़ीन रखते थे।

उनका ख़ानदान इस्लाम के शुरूआती दिनों में नबी मुहम्मद (स.अ.व.) का मुख़ालिफ़ था। मगर ख़ालिद की बहादुरी बचपन से ही नज़र आती थी। वो एक माहिर सिपाही थे और मक्का की फ़ौज में अहम ओहदे पर थे। ये वो वक़्त था जब वो इस्लाम के ख़िलाफ़ खड़े थे, लेकिन जल्द ही उनकी क़िस्मत बदलने वाली थी।

इस्लाम से पहले: मुख़ालफ़त और उहुद की जंग

इस्लाम क़बूल करने से पहले हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (र.अ.) क़ुरैश की फ़ौज के एक बड़े कमांडर थे। वो नबी मुहम्मद (स.अ.व.) और मुसलमानों के सख़्त दुश्मन थे। 625 ईसवी में उहुद की जंग में उन्होंने क़ुरैश की घुड़सवार फ़ौज की क़ियादत की। इस जंग में मुसलमानों ने शुरू में कामयाबी हासिल की, मगर तीरंदाज़ों के अपनी जगह छोड़ने की वजह से ख़ालिद ने पीछे से हमला किया और मुसलमानों को बड़ा नुक़सान पहुंचाया। नबी मुहम्मद (स.अ.व.) ख़ुद ज़ख़्मी हुए, और उनके चचा हज़रत हमज़ा (र.अ.) शहीद हो गए। ये जंग मुसलमानों की इकलौती हार थी, और इसमें ख़ालिद की हिकमत का बड़ा हाथ था।

628 ईसवी में हुदैबिया के मुआहदे के वक़्त ख़ालिद ने 200 घुड़सवारों के साथ नबी मुहम्मद (स.अ.व.) को रोकने की कोशिश की, मगर नबी ने दूसरा रास्ता इख़्तियार करके टकराव टाल दिया। इस वाक़िए ने ख़ालिद के दिल में इस्लाम की ताक़त के बारे में सवाल पैदा किए। वो सोचने लगे कि इस्लाम इतनी तेज़ी से क्यों फैल रहा है। इस मुख़ालफ़त के दौर में ख़ालिद ने कई छोटी-मोटी जंगों में हिस्सा लिया, मगर उहुद उनकी सबसे बड़ी कामयाबी थी।

इस्लाम क़बूल करना: ज़िंदगी का बड़ा मोड़

627 या 629 ईसवी में हुदैबिया के मुआहदे के बाद हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (र.अ.) ने इस्लाम क़बूल कर लिया। वो अमर बिन अल-आस और उस्मान बिन तल्हा के साथ मदीना पहुंचे और नबी मुहम्मद (स.अ.व.) के सामने इस्लाम क़बूल किया। नबी ने उन्हें माफ़ कर दिया और फ़रमाया कि इस्लाम क़बूल करने से पिछले गुनाह मिट जाते हैं। ख़ालिद ने अपनी पुरानी ग़लतियों के लिए माफ़ी मांगी, और नबी ने उनके लिए दुआ की।

इस्लाम क़बूल करने के बाद ख़ालिद को मदीना में ज़मीन दी गई, मगर देर से आने की वजह से वो छोटी थी। उन्होंने इसे वक़्फ़ (दान) कर दिया, ताकि उनके औलाद इसे बेच न सकें। ये फ़ैसला उनकी नई ज़िंदगी की शुरुआत था। अब वो मुसलमानों की फ़ौज के लिए अपनी बहादुरी को वक़्फ़ करने लगे।

नबी (स.अ.व.) के ज़माने में ख़िदमात और मुताह की जंग

इस्लाम क़बूल करने के बाद हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (र.अ.) ने नबी मुहम्मद (स.अ.व.) की ख़िदमत में कई ग़ज़वात किए। 629 ईसवी में मुताह की जंग में उन्होंने क़ियादत की। ये मुसलमानों और रूमी (बीजान्टाइन) सल्तनत के बीच पहली जंग थी। मुसलमानों की फ़ौज छोटी थी, और तीन कमांडर शहीद हो गए। तब ख़ालिद ने क़ियादत संभाली और होशियारी से फ़ौज को पीछे हटाया। उन्होंने फ़ौज की साफ़ें बदलीं और ऐसा दिखाया जैसे नई मदद आ गई है, जिससे दुश्मन डर गया। इस जंग में उनकी नौ तलवारें टूट गईं।

नबी मुहम्मद (स.अ.व.) ने उन्हें "सैफुल्लाह अल-मस्लूल" यानी "अल्लाह की निकाली हुई तलवार" की उपाधि दी। 629-630 में मक्का की फ़तह में उन्होंने बनू सुलैम की टुकड़ी की क़ियादत की। हुनैन की जंग में भी वो शामिल हुए। 630 में उन्होंने अल-उज़्ज़ा की मूरत तोड़ी और कई क़बीलों को इस्लाम की दावत दी। उन्होंने दुमात अल-जंदल पर क़ब्ज़ा किया और नजरान के बालहारिथ क़बीले को इस्लाम सिखाया। इन ग़ज़वात ने इस्लाम के फैलाव में बड़ी भूमिका अदा की।

रिद्दा जंगें: मुरतदों के ख़िलाफ़ जिहाद

नबी मुहम्मद (स.अ.व.) के विसाल के बाद 632 ईसवी में कई क़बीले इस्लाम से फिर गए। ख़लीफ़ा अबू बक्र (र.अ.) ने हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (र.अ.) को रिद्दा जंगों में कमांडर बनाया। बुज़ाखा की जंग में उन्होंने तुलैहा को हराया। फिर मलिक बिन नुवैरा को शिकस्त दी, हालांकि इस पर कुछ इख़्तिलाफ़ हुआ और हज़रत उमर (र.अ.) ने सजा की मांग की, मगर अबू बक्र ने माफ़ कर दिया।

633 ईसवी में यमामा की जंग में उन्होंने मुसैलमा कज़्ज़ाब को हराया। ये जंग बहुत ख़ूँख़ार थी, जिसे "बाग़-ए-मौत" कहा जाता है। ख़ालिद ने फ़ौज को दोबारा तरतीब दी और दुश्मन की कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाया। इस फ़तह से नजद और यमामा मुसलमानों के क़ब्ज़े में आ गए। रिद्दा जंगों ने अरब जज़ीरे को एकजुट किया और इस्लामी रियासत को मज़बूत किया।

इराक़ और पारस पर फ़तह: सासानी सल्तनत का ख़ातमा

633-634 ईसवी में हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (र.अ.) ने सासानी इराक़ पर हमले किए। उन्होंने उबुल्ला, धात अल-सालासिल, नहर अल-मारा, मधर, उल्लैस, वलाजा जैसी जंगें जीतीं। वलाजा में उन्होंने अहम चाल चली और दुश्मन को घेर लिया। उन्होंने अल-हीरा पर क़ब्ज़ा किया और जज़िया लिया। फिर अन्बार और अय्न अल-तमर जीते।

अप्रैल 634 में अबू बक्र ने उन्हें शाम (सीरिया) भेजा, जहां अल-मुथन्ना बिन हारिथा को इराक़ की क़ियादत सौंपी। इन जंगों में ख़ालिद की हिकमत थी कि वो दरिया की वादी पर तवज्जोह देते और अरब क़बीलों को अपने साथ मिलाते। इन फ़तहों से इस्लामी सल्तनत का वुसअत हुआ।

शाम और रूमी सल्तनत पर फ़तह: यर्मूक की बड़ी जंग

634 ईसवी में हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (र.अ.) शाम पहुंचे और सुप्रीम कमांडर बने। उन्होंने अजनादैन (जुलाई 634), फहल (634-635), और दमिश्क़ की घेराबंदी की। दमिश्क़ में उन्होंने बाब शर्क़ी से शहर में दाख़िल होकर उसे जीता और जज़िया के बदले लोगों की हिफ़ाज़त दी।

636 ईसवी में यर्मूक की जंग रूमी फ़ौज के ख़िलाफ़ हुई। ख़ालिद ने घुड़सवार फ़ौज का इस्तेमाल करके दुश्मन को घेरा। उन्होंने नक़ली पीछे हटने की चाल (फ़ीन्ड रिट्रीट) इस्तेमाल की और दुश्मन को नाक़िस जगह पर खींचा। औरतों को फ़ौज के पीछे रखा ताकि कोई भाग न सके। इस जंग में रूमी फ़ौज बुरी तरह हारी, और फ़िलिस्तीन, ट्रांसजॉर्डन, शाम मुसलमानों के क़ब्ज़े में आ गया।

637 में आयरन ब्रिज और हाज़िर की जंगें जीतीं, जिससे उत्तरी शाम और दक्षिणी तुर्की पर क़ब्ज़ा हुआ। हरक्यूलस को शिकस्त दी गई।

अहम जंगों की फ़ेहरिस्त और हिकमतें

हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (र.अ.) ने 200 से ज़्यादा जंगें लड़ीं। कुछ अहम जंगें ये हैं:

  • उहुद की जंग (625 ईसवी): दुश्मन के तौर पर, पीछे से हमला करके फ़तह हासिल की।
  • मुताह की जंग (629 ईसवी): छोटी फ़ौज से बड़ी रूमी फ़ौज का मुक़ाबला, सलामती से पीछे हटना।
  • चेन की जंग (633 ईसवी): पारसी फ़ौज के ख़िलाफ़ पहली फ़तह।
  • वलाजा की जंग (633 ईसवी): घेराबंदी की हिकमत।
  • यर्मूक की जंग (636 ईसवी): घुड़सवार हमले और नक़ली पीछे हटना।
  • फ़िराज की जंग (634 ईसवी): पारसी और ईसाई अरबों को हराया।

उनकी हिकमतों में शामिल था: दुश्मन को घेरना, होशियारी से पीछे हटना, फ़ौज का दोबारा तरतीब देना, और ईमान पर मबनी जोश।

अल्लाह की तलवार की उपाधि और उसकी वजह

मुताह की जंग में बहादुरी के लिए नबी मुहम्मद (स.अ.व.) ने हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (र.अ.) को "अल्लाह की तलवार" की उपाधि दी। ये उपाधि उनकी इस्लामी फ़ौज की कामयाबियों के लिए थी, जैसे रूमी शाम, मिस्र, पारस और मेसोपोटामिया पर फ़तह। वो अल्लाह के हुक्म की तरह दुश्मनों पर टूट पड़ते थे। ये नाम उनकी मीरास का हिस्सा बन गया।

क़ियादत से हटाना और आख़िरी ज़िंदगी

638 ईसवी में ख़लीफ़ा उमर (र.अ.) ने हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (र.अ.) को क़ियादत से हटा दिया। वजह उनकी बढ़ती शोहरत और दौलत थी, जो सियासी ख़तरा बन सकती थी। उमर ने अबू उबैदा बिन अल-जर्राह को कमांडर बनाया। ख़ालिद ने इसे क़बूल किया और आम सिपाही के तौर पर ख़िदमत की।

वो मदीना वापस आए और 642 ईसवी में होम्स, शाम में उनका विसाल हुआ। उनकी क़ब्र होम्स में है। आख़िरी दिनों में वो सुकून की ज़िंदगी गुज़ारते थे और इस्लाम की ख़िदमत में लगे रहे।

मीरास: एक लाजवाब सिपहसालार की याद

हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (र.अ.) की मीरास इस्लामी तारीख़ में हमेशा ज़िंदा रहेगी। उन्होंने इस्लामी सल्तनत को वुसअत दी और अपनी हिकमतों से दुनिया को मुतास्सिर किया। आज भी उनकी कहानी जोश देती है। वो साबित करते हैं कि हक़ की राह पर चलकर कोई भी बड़ा बन सकता है। उनकी ज़िंदगी हमें सिखाती है कि बहादुरी के साथ इन्किसारी भी ज़रूरी है।

अगर आप ख़ालिद बिन वलीद की ज़िंदगी पर और जानना चाहें, तो किताबें जैसे "ख़ालिद बिन अल-वलीद" पढ़ें।  उम्मीद है, ये पढ़कर आपको अच्छा लगा!

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