Karbala Ka Waqia in Hindi । कर्बला का वाकया हिन्दी में।

Karbala Ka Waqia in Hindi:- वाकया कर्बला तारीख का दर्दनाक वाकया है। ये इकत्दार की जंग नहीं थी अकदार की जंग थी। दो शख्सियत की लड़ाई नहीं थी दो नजरियात का टकराव था। ये हक और बातिल का मारका था। यजीद ज़ुल्म का इस्तयारा है। हुसैन इब्ने अली अमन की आलामात है। यजीद जब्र का पुतला हैं। हुसैन सब्र के पैकर है। यजीद अपनी बद्दतीनत फितरत और अपनी तपे ना हमवार के बाईस दुनिया पर जिल्लतो रुसवाई , ज़ुल्म जब्र, जोरो ज्यादती की अलामत बन के उभरा । और हुसैन इब्ने अली रजिअल्लाहू तआला अनहू हक ओ सदाकत के निशान बन के उभरे। कर्बला के तपते हुए रेगजार में हुसैनी और यजीदी दो किरदार सामने आते है।
यजीद बहदल की बेटी मैसून का नापाक बेटा था। और हुसैन मुहम्मद अरबी (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) की बेटी फातिमा के शहजादे थे। यजीद दमिश्क के अतराफ में सरजून और जरीर अख्तल जैसे औबाशो के झुरमूट में पल कर जवान हुआ। हुसैन का दरवाजा मस्जिद नबवी के अन्दर खुलता था। यजीद नशे में धूत हो कर के नमाजे छोड़ देता था। हुसैन की कर्बला के अन्दर भी नमाजे तहजूद कजा नहीं हुई। यजीद ज़ुल्म का दुसरा नाम है। हुसैन अमन की आलामात है। 
आइए तफसील से जानते हैं कर्बला का वाकया। मुहर्रम का महीना चल रहा है और इसी मोहर्रम को मद्देनजर रखते हुए हम आप लोगों के लिए कर्बला का किस्सा बयान कर रहे हैं। 

Karbala Ka Waqia in Hindi । कर्बला का वाकया हिन्दी में।


Karbala Ka Waqia in Hindi । कर्बला का वाकया हिन्दी में।

Karbala Ka Waqia in Hindi । कर्बला का वाकया हिन्दी में।

जब 60 हिजरी में हज़रत सैय्यदना अमीर मुआविया रजिअल्लाहू अनुहू का इंतेक़ाल हुआ और यज़ीद उनका जांशीन बना, तब ताख़्त-ए-हुकूमत पर बैठते ही उसके लिए सबसे अहम मसला हज़रत सैय्यदना इमाम हुसैन, हज़रत सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर और हज़रत सैय्यदना अब्दुल्लाह बिन उमर से बैअत लेने का था। क्योंकि इन हज़रातो ने यज़ीद को अमीर मुआविया का वली अहद तस्लीम नहीं किया था। इस के अलावा इन हज़रातो से यज़ीद को यह भी ख़तरा था कि कहीं इन में से कोई खलीफ़त का दावा न कर दे और कहीं ऐसा न हो कि सारा हिजाज़-मक्कदस मेरे खिलाफ़ उठ खड़ा हो, जबकि इमाम हुसैन रजि अल्लाहू तआला अनुहू के दावा ख़िलाफ़त की सूरत में, इराक़ में भी बग़ावत का सख़्त अंदेशा था।
उन वजहों की बिना पर यजीद के पेश नज़र सबसे बड़ा मसला अपनी हुकूमत की बक़ा और उसे तहफ़ज़ देना था, लेहजा इस ने उन हज़रात-ए-मुक़द्दसा से बैअत लेना ज़रूरी समझा। चुनांचे इस ने मदीना मुनव्वरा के गवर्नर वलीद बिन उक्बा को हज़रत सैय्यदना अमीर मुआविया की वफात की ख़बर दी और साथ ही उन हज़रात-ए-मुक़द्दसा से बैअत लेने के लिए सख़्त ताक़िदी हुक्म भेजा। वलीद ने हज़रत सैय्यदना इमाम हुसैन रजि अल्लाहू तआला अनुहू को हज़रत सैय्यदना अमीर मुआविया की वफात की ख़बर दी, और यज़ीद की बैअत के लिए कहा। आप रजि अल्लाहू तआला अनुहू ने ताज़ीत के बाद फ़रमाया कि मेरे जैसा आदमी इस तरह छुप कर बैअत नहीं कर सकता और न भी मेरे लिए इस तरह छुप कर बैंत करना अच्छा है। अगर आप बाहर निकल कर आम लोगों को और उन के साथ हमें भी दावत दें तो यह सबसे अच्छा होगा।

इमाम हुसैन रजि० को यजीद का बैत नामंजूर।

यज़ीद की बैअत हज़रत सैय्यदना इमाम हुसैन रजि अल्लाहू तआला अनुहू को कल्बी तौर पर सख्त नापसंद थी क्योंकि वह ना अहल था और उसका तक़र्र भी ख़लीफ़ा ए राशिदीन के इस्लामी तरीक़ा इंतखाब के बिल्कुल ख़िलाफ़ हुआ था। इसलिए आप एहतिजाज़न उस के ख़िलाफ़ थे और दूसरी तरफ़ हालात इजाज़त नहीं दे रहे थे कि आप अली उल आलान उस के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करें। लेहजा आप रजिअल्लाहू तआला अनहू ने अपने अहल-ओ-अयाल और अज़ीज़-ओ-अक़ारिब को साथ लेकर मदीना मुनव्वरा से मक्का मुकर्रमा की तरफ़ हिजरत फरमा ली। आप रजि अल्लाहू तआला अनहू के मक्का मुकर्रमा पहुंचने की ख़बर सुनकर लोग आप की ख़िदमत में हाजिर होकर ज़ियारत का शर्फ़ हासिल करने लगे।

हज़रत इमाम हुसैन को कुफा आने की दावत।

जब अहल-ए-कूफ़ा को हज़रत सैय्यदना अमीर मुआविया रजिअल्लाहू तआला अनहू के इंतेक़ाल की ख़बर मिली और उन्हें इस बात का इल्म हुआ कि हज़रत सैय्यदना इमाम हुसैन रजि अल्लाहू तआला अनहू ने यज़ीद की बैअत से इनकार कर दिया है, तो उन्होंने सैय्यदना इमाम हुसैन रजि अल्लाहू तआला अनहू के नाम हज़ारों की तादाद में ख़त लिखे कि आप जल्द से जल्द कूफ़ा तशरीफ़ लाएं, मस्नद-ए-ख़िलाफ़त आप के लिए ख़ाली है। हमारे अम्वाल और हमारी गर्दनें आप के लिए हाज़िर हैं, सब के सब आप के मुंतज़िर और मुश्ताक़ हैं। और आप के सिवा हमारा कोई इमाम और पेशवा नहीं है, आपकी मदद के लिए हमने यहां हज़ारों का लश्कर तैयार रखा है।
हज़रत इमाम हुसैन रजि अल्लाहू तआला अनहू ने जब अहल-ए-कूफ़ा के ख़तों में उन के जज़्बात अक़ीदत और मोहब्बत, जान और माल कुर्बान करने की तमन्नाओं और कूफ़ा आने की इल्तिज़ा को देखा तो फ़ैसला किया कि हालात मालूम करने के लिए पहले अपने चचाज़ात भाई हज़रत मुस्लिम बिन अक़ील रजिअल्लाहू तआला अनहू को भेजा जाए। चुनांचे आप ने उन्हें अहल-ए-कूफ़ा के नाम एक ख़त दिया और फ़रमाया कि आप कूफ़ा जा कर बज़ात ख़ुद बराह रास्त हालात का सही अंदाज़ा लगा कर हमें इत्तला दीजिए, अगर हालात साज़गार हो तो मैं भी आ जाऊंगा और अगर हालात ना मुनासिब हों तो आप भी वापस तशरीफ़ ले आइए।

हज़रत अलामा सय्यद नईमुद्दीन मुरादाबादी के नजरियात।

सदर अल फ़ाज़िल हज़रत अलामा सय्यद नईमुद्दीन मुरादाबादी रजिअल्लाहू तआला अनहू फ़रमाते हैं कि अगर चे इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू की शहादत की ख़बर मशहूर थी और कूफ़ीयों की बेवफ़ाई का पहले भी तजर्बा हो चुका था, मगर जब यज़ीद बादशाह बन गया तो उस की हुकूमत और सल्तनत दिन ए इस्लाम के लिए ख़तरा थी और उसी सबब से उस की बैअत नारवा थी और वह तरह तरह की तदबीरों और हिलों से चाहता था कि लोग उस की बैअत कर लें। उन हालात में कूफीयों का बपास-ए-मिल्लत यज़ीद की बैअत से दस्तकशी करना और हज़रत इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू से तालिब बैअत होना, इमाम पर लाज़िम करता था कि उन की दरख्वास्त क़ुबूल फरमाएं। जब एक क़ौम ज़ालिम और फासिक़ की बैअत पर राज़ी न हो और साहिब-ए-इस्तहक़ अहल से दरख़्वास्त बैअत करें, उस पर अगर वह उन की इस्तीयाद़ क़ुबूल न करें तो उस के ये मानी होते हैं कि वह उस क़ौम को उस जाबिर ही के हवाले करना चाहता है। इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू अगर उस वक़्त कूफ़ीयों की दरख़्वास्त को क़ुबूल न फ़रमाते, तो बारगाह-ए-इलाही अज़्-व-जल में कूफ़ीयों के इस मुतालिबा का इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू के पास क्या जवाब होता, कि "हम हर चंद दरपे हुए मगर इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू बैअत के लिए राज़ी न हुए, इसी लिए हमें यज़ीद के ज़ुल्म ओ तशद्दुद से मजबूर होकर उस की बैअत करना पड़ी, अगर इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू हाथ बढ़ाते तो हम उन पर जानें फ़िदा करने के लिए हाज़िर थे"
यह मसला ऐसा दर पेश आया जिसका हल बिना इस के और कुछ नहीं था कि हज़रत इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू उन की दावत पर लबैक फरमाएं। अगर चे अकबर सहाबा कराम हज़रत इब्न अब्बास व हज़रत इब्न उमर व हज़रत जाबिर व हज़रत अबू सैद वगैरह हम रजिअल्लाहू तआला अनहू उन हज़रत इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू की इस राय से मुतफ़िक़ नहीं थे और उन्हें कूफ़ीयों के अहदों मुआवज़िक़ का एतबार नहीं था, इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू की मोहब्बत और शहादत हज़रत इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू की शोहरत, उन सब के दिलों में इखत्लाज पैदा कर रही थी। गोया कि यह यक़ीन करने की भी कोई वजह नहीं थी कि शहादत का यही वक़्त है और इसी सफ़र में यह मर्हला दर पेश होगा, लहज़ा अन्देशा माने था।
बहरहाल हज़रत सय्यदना मुस्लिम बिन अक़ील रजिअल्लाहू तआला अनहू ने अहल-ए-कूफ़ा की बेपनाह मोहब्बत और आक़ीदत को देख कर हज़रत इमाम हुसैन रद्दऐल्लाहु तआला अनह की खिदमत में ख़त लिख कर भेजा कि हज़ारों अफ़राद ने मेरे हाथ पर बैअत कर ली है और यहां के सब लोग आप की तशरीफ आवरी के मुंतज़िर हैं। इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू ने इस इत्लाह के बाद कूफ़ा जाने का अज़म समीम कर लिया और इधर कूफ़ा में जो फ़साद बरपा हो चुका था उस की आप को इत्लाह नहीं हुई थी।

हज़रत इमाम हुसैन का कुफा जाना।

हज़रत सैय्यदना इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू ने 3 जिल्हज 60 हिज्री को अपने अहल-ए-बैत, ख़ादिमों, आदि को, कुल 82 अफ़राद को हमराह ले कर राह-ए-इराक़ इख्तियार फरमाया। रास्ते में हज़रत सैय्यदना इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू को कूफ़ीयों की बद-उहद्दी और हज़रत सैय्यदना मुस्लिम बिन अक़ील रजिअल्लाहू तआला अनहू की शहादत की ख़बर मिल गई थी। इस पर सैय्यदना इमाम हुसैन रजिअल्लाहू अनहू के रफ़क़ा की आराएं मुख्तलिफ़ हुईं और एक बार आप रजिअल्लाहू तआला अनहू ने भी वापसी का क़स्द फरमाया लेकिन बहुत गुफ़्तगू के बाद यही तय पाया कि सफ़र जारी रखा जाए और वापसी का ख़याल तर्क कर दिया जाए। हज़रत सैय्यदना इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू ने भी इस राए से इत्तेफ़ाक़ किया और क़ाफ़िला आगे चल दिया यहां तक कि हज़रत सैय्यदना इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू ने करबला में नज़ूल फरमाया।

" कर्बला "जंग का मैदान

यह मुहर्रम उल हराम 61 हिज्री की 2 तारीख थी। आप रजिअल्लाहू तआला अनहू ने इस मक़ाम का नाम दरयाफ़्त किया तो मालूम हुआ कि इस जगह को "करबला" कहते हैं। हज़रत सैय्यदना इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू करबला से वाक़िफ़ थे और आप को मालूम था कि करबला ही वह जगह है जहां अहल-ए-बैत रिसालत को राह-ए-हक़ में अपने ख़ून की नदियाँ बहानी होंगी। इन्हीं दिनों आप रजिअल्लाहू तआला अनहू को हूजूर सय्यद आलम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की ज़ियारत हुई। नबी ए करीम सल्लल्लाहू अलैहि वस्सलाम ने आप को शहादत की ख़बर दी और आप के सीना मुबारक पर दस्त-ए-अक़्दस रख कर दुआ फ़रमाई "ऐ अल्लाह हुसैन को सब्र ओ अज्र अता फरमा"।

यजीद की बैत के लिए हुसैन इब्ने अली को बुलावा।

फिर इब्न ज़ियाद ने हज़रत सैय्यदना इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू को एक ख़त लिख कर भेजा कि यज़ीद की बैंत कर लीजिए। जब वह ख़त आप रजिअल्लाहू तआला अनहू के पास पहुंचा, आप ने उसे पढ़ कर फेंक दिया और ख़त लाने वाले क़ासिद से फरमाया कि इस वक़्त मेरे पास इस का कोई जवाब नहीं। इल्ची ने आकर इब्न ज़ियाद को बताया तो जवाब सुन कर इब्न ज़ियाद का ग़ुस्सा बड़ा उठा, उसने लोगों को जमा किया फौजियों को तैयार की और उन का सिपहसालार उमर बिन साद को बनाया जो मलक रय का वाली था। अव्वलन उसने पहलू तही से काम लिया, उस पर इब्न ज़ियाद ने कहा कि या तो लड़ने के लिए तैयार होजा या फिर रय की हुक़ूमत छोड़ कर घर बैठ जा।
इब्न साद ने रय की हुक़ूमत इख़्तियार की और 22 हज़ार सवार और पेयादह लश्कर ले कर नवास ए रसूल हज़रत सैय्यदना इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू से लड़ने चल पड़ा। यहां तक कि यह लोग दरियाए फ़ुरात के किनारे पर काबिज़ हो कर क़ाफ़िला सय्यद इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू और पानी के दरमियान हाइल हो गए। और पुरी तरह से पानी बंद कर दिए। ताकि हज़रत इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू मजबूर हो कर यजीद की बैत कर लें। यहां यह कार्रवाई हुई कि सभी खेमों को एक-दूसरे के करीब कर दिया गया, खेमों के पीछे खंदक खोदी गई और उसे नरकल आदि सूखी लकड़ियों से भर दिया गया।
अब इमाम हुसैन के रफ़क़ा कामों से फ़ारिग़ होकर सैय्यदना इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू की ख़िदमत में हाज़िर हुए हैं और सैय्यदना इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू ने अपने अहल और साथियों से फ़रमाया कि "सुबह दुश्मन से हमारा मुक़ाबला है, मैंने बाख़ुशी तमाम, तुम सब को इजाज़त दी, अभी रात बाक़ी है जहां जगह पाओ चले जाओ और एक-एक शख़्स मेरे अहल बैत में से एक-एक को साथ ले जाओ, अल्लाह अज़्वज़ल तुम को ज़ज़ाए ख़ैर दे! देहात ओ बिलाद में मुतफ़र्रिक़ हो जाओ, यहां तक कि अल्लाह तआला बिला टाले, दुश्मन जब मुझे पाएंगे तुम्हारा पीछा नहीं करेंगे।" यह सुन कर इमाम के भाईयों साहबज़ादों और अब्दुल्लाह बिन ज़फ़र के बेटों ने अर्ज़ की कि "ऐसा हम किस लिए करें? इसलिए कि आप रजिअल्लाहू तआला अनहू के बाद ज़िंदा रहें? अल्लाह अज़्वजल हमें वो मनहूस दिन न दिखाएं कि आप नहीं हों और हम ज़िंदा रहें।"

कर्बला में अली असगर की शहादत।

हजरत इमाम हुसैन के बच्चे बिल खुसुश ख़्वातीन प्यास की बिद्दत में हलक खुश्क है। हज़रत शकीना तड़प के अपने बाप से कहती हैं। के मुझे 6 माहीने के अली असगर की प्यास नही देखी जा रही है। हज़रत इमाम हुसैन बच्चे को हाथो मे उठाते हैं और नहर ए फिरात पे पहुंच के फरमाते हैं। तुम्हारा मामला मेरे साथ है इस 6 माहीने के बच्चे ने तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ा है। और चुल्लू भर के उसे पानी पिलाना चाहते हैं । तभी एक तीर आता है जो अली असगर के गले को चीर देता है । ख़ून बहने लगता है। गर्दन लटक जाती है। हज़रत इमाम हुसैन वो बहता हुआ खून अपने हाथों में लेकर आसमान की तरफ उछाल कर कहते हैं। मालिक हुसैन की ये कुर्बानी भी कबुल कर। बहरहाल हज़रत इमाम हुसैन अली असगर को लेकर खेमें की तरफ़ चल देते हैं । लेकिन ज़ुबान पर कोई शिकायत नहीं है। कहते हैं मालिक हुसैन की ये कुर्बानी भी कबुल कर ले । अब ख़ेमों की तरफ आना सहरबानो उम्मे रबाब सय्यदा जैनब , हजरतें शकीना सलामुल्लाह अलैहा का सामना कोई आसान काम नहीं था । लेकिन हुसैन इब्ने अली आते हैं । शहजादे को यहां खेमों के करीब रख के कहते हैं कि ये हौजे कौशर से शैराब हो गया है। अल्लाहू अकबर। कोहराम मच जाता है

यहां तक कि इब्न साद ने अपने लश्कर के साथ इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू और आप के रफ़क़ा पर हमला कर दिया। आप के रफ़क़ा, अहबाब, बिरादराना और शहज़ादगान एक-एक करके शहीद होते चले गए। तक़रीबन 50 से ज़ायदा अफ़राद शहीद हो गए और बिल आखिर हज़रत इमाम हुसैन रजिअल्लाहू तआला अनहू को भी बड़ी बेदर्दी के साथ शहीद कर दिया गया।

हज़रत इमाम हुसैन की शहादत

इसी तरह, एक-एक करके, हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के अहल-ए-बैत से तमाम नौजवान और बहादुर जंगजू शहीद होते गए और क़ुर्बानी का प्याला पी लिया। धिरे-धिरे, जब हज़रत इमाम हुसैन के सभी यार अपनी शहादत हासिल कर गए तो उन्होंने फ़ैसला किया कि अब ख़ुद मैदान में तलवार लेकर निकला जाएं । वो मैदान में गए और यजीदी फौज से लड़ना सुरू कर दिया। इमाम हुसैन अकेले यज़ीदी फ़ौज का मुकाबला काफ़ी देर तक किया।
अकेले होने के बावजूद, किसी ने भी हज़रत इमाम हुसैन को मुकाबला करने का जुर्रत नहीं की, और उसकी सिर्फ़ एक वजह थी कि वह हज़रत अली के प्यारे बेटे थे। उस वक़्त, यज़ीदी फ़ौज के फ़ौजी हुक़्मरान इब्न-ए-साद ने महसूस किया कि वह हज़रत अली के बेटे से किसी भी तरह मुकाबला नहीं कर सकते। इसलिए, उन्होंने अपने तमाम सिपाहियों को इमाम हुसैन की मुखालिफ़त में एक साथ हमला करने का हुक्म दिया। उनके एक साथ हमले के बावजूद, इमाम हुसैन ने साबित किया कि बातिल, चाहे तादाद में कितना भी बढ़ जाए, हक़ और सच के मुकाबले में कभी नहीं टिकता।

हज़रत इमाम हुसैन की शहादत के बाद।

जब हुसैनियत और यज़ीदियत के बीच खतरनाक जंग चल रही थी, उस दौरान असर की नमाज़ का समय आ गया। इतनी मुश्किल हालत और जख़्मी हालत में भी हज़रत इमाम हुसैन को नमाज़ पढ़ने का इरादा था। जैसे ही उन्होंने नमाज़ शुरू की, यज़ीदी फौज को वह अवसर मिल गया, जिसका वे लोग एक लम्बे समय से इंतजार कर रहे थे। हज़रत इमाम हुसैन सजदे में गए, जब शिमर जिल जोसन ने अपनी तलवार चलाई और हज़रत इमाम हुसैन के सर को शरीर से जुदा कर दिया ।हज़रत इमाम हुसैन की शहादत के बाद, यज़ीदी लोगों ने उनके सर को एक खंजर पर रखकर कूफ़ा शहर में घुमाया। वे गलियों में घूमते रहे । करबला के जंग मे, हज़रत इमाम हुसैन के घरानों में से एक बेटे, जिनका नाम हज़रत जैनुल अबिदीन था, बच गये। उनके अलावा, हज़रत इमाम हुसैन के घर की सभी औरतें कूफ़ा में बंदी बनाकर लाई गईं। हज़रत इमाम हुसैन की इस दिन की शहादत के बावजूद, उनकी विरासत आज तक लोगों के दिलों में जिंदा है और कयामत तक रहेगी। जबकि यज़ीद शाम की अँधेरी में गुम हो गया है, हुसैन हर दिल में रौशनी की तरह जिंदा है।

हज़रत इमाम हुसैन और इमाम हसन से नबी की मुहब्बत।

एक दिन सुर्ख रंग के जोड़े पहने हुए हसनैन करीमैन हुजरे फातिमा से निकलते है। कम उम्री की वजह से कभी गिरते हैं, कभी संभालते हैं। और आका करीम ख़ुत्बा इरशाद कर रहे हैं ख़ुत्बा छोड़ कर हुज़ूर ने शहजादों को उठा लिया । वो मंजर भी जमाने ने देखा, हजरत ये अब्दुल्ला बिन शद्दाद कहते हैं कि हुजूर सजदे में थे और सज्दा इतना तविल हो गया। हमें लगा या तो वहीं का नजूल हो रहा है या फिर अल्लाह का हुक्म आ गया। और अल्लाह के महबूब की रुह कब्ज कर ली गई है। लेकिन मैंने जब नज़रें उठा के थोड़ा सा देखा तो क्या मंज़र था कि हुसैन इब्ने अली हुजूर की पुश्त पे बैठे हुए हैं। और मेरे आका सजदे को तूल दे रहे। अल्लाहु अकबर । हुसैन के लिए पैगंबर के सजदो को तूल दिया जा रहा है। हुसैन इब्ने अली कभी मिम्बर पे हूजूर की अतराफ में बैठते हैं। वो मंजर भी दुनिया ने देखा की हूजूर के मुबारक कंधों पर हुसैन इब्ने अली बैठे है और हुजूर की जुल्फों को पकड़ा हुआ है । तो हजरत उमर रजिअल्लाहू अनुहू देख के कहते है वाह वाह कैसी सवारी मयशर आई हुसैन इब्ने अली को । तो मेरे आका मुस्कुराके कहते हैं, उमर सवारी देखते हो? सवार भी तो देखो । अल्लाहु अकबर।
हज़रत उसमा बिन ज़ैद बिन हारसा रजिअल्लाहू तआला अनहू फरमाते हैं। रात का एक पहर गुजर गया और मुझे हूजूर से कोई काम था, मैं आका करीम की खिदमत में हाजिर हुआ , दरें दौलत पे दस्तक दी। हुजूर तशरीफ लाये तो चादर ओढ़ी थी। तो मैंने अपनी हाजत कही तो हूजूर ने मेरी हाजत पूरी कर दी ।लेकिन एक मंजर मैंने देखा कि हुजूर ने जो चादर ओढ़ी थी उसके अतराफ में पहलुओं में उभार थी, जिस तरह अंदर कोई हो, मुझसे ना रहा गया, मैंने पूछ लिया, मैंने कहा बंदा नवाज़ चादर के अंदर क्या है? तो हूजूर ने चादर को खोल दिया। तो कहते हैं मैंने अपनी आँखों से देखा। एक पहलू से इमाम हुसैन लिपटे हुए थे। और एक पहलू से इमाम ए हसन लिपटें हुए थे ।
फ़रमाया ये मेरी बेटी के बेटे हैं ऐ अल्लाह मै इनसे प्यार करता हूं, तू भी इनसे प्यार कर। जो इनसे प्यार करे तु उनसे भी प्यार कर ।‌ इनकी मोहब्बत का दर्श दिया। इनके प्यार का सबक पढ़ाया। कहा इनसे प्यार करने वाला मेरे से प्यार करने वाला है। इनसे बुग्ज रखने वाला मेरे से बुग्ज रखने वाला है।
उनकी तकलीफ हूज़ूर को बेचैन कर देती थीं। एक दिन नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम हज़रत ए सईदा फातिमा तो जहरा रजिअल्लाहू तआला अनहा के घर के करीब से गुजरे तो हज़रत इमाम हुसैन के रोने की आवाज आ रही थी तो आपका करीम अलैहिस्सलाम ने फरमाया के फातिमा हुसैन को चुप करवाओ। तू जानती नहीं हुसैन का रोना मुझे दुख देता है। हुसैन इब्ने अली को हूजूर रोने नहीं देते थे, उनको दुखी नहीं होने देते थे क्योंकि रसूलल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम जानते थे के ये कितने दुख सहेगा, कितनी तकलीफों से गुजरेगा और कितने मसाएब सहेगा।

आखिरकार।

यज़ीद बिन मुआविया अबू खालिद उमवी वह बदबख़्त शख़्स है जिसकी पेशानी पर अहले बैत कराम अलैहिमु रज़वान के बे-गुनाह क़त्ल का सियाह दाग़ है। यही वह शख़्स है जिस पर हर ज़माने में पूरी दुनिया इस्लाम मलामत करती रही है और क़यामत तक उसका नाम हक़ारत से लिया जाएगा।


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